वर्किंग कैपिटल लोन्स कैसे बिजनेस में कैश फ्लो बरकरार रखने में मदद करते हैं?

Working capital loans for business cash flow

बिजनेस में हर महीने मासिक बिल, उपकरण खरीद, मशीनरी, इन्वेंट्री, टूल्स, फिक्स्ड एंड पर्सनल असेट्स, कच्चा माल, प्रॉपर्टी व ऑफिस परिसर, ट्रेडमार्क व सलाह और मार्गदर्शन के लिए पैसे की जरूरत पड़ती है. इन सबके बीच सटीक संतुलन होने के साथ-साथ रोजमर्रा के ऑपरेशन्स, प्रबंधन व संचालन पूंजी के अलावा लेबर और निजी खर्चे के लिए भी आपके पास पैसा होना चाहिए. एक बिजनेस छोटी या बड़ी पूंजी से शुरू होता है. वह उसके बिजनेस व मॉडल पर निर्भर होता है, जिस पर पहली बार उसे स्थापित किया जाता है. ग्राहकों की बदलती पसंद, खरीद की आदत और बर्ताव को देखते हुए आपको इसे विस्तार और आधुनिक बनाना पड़ता है. कंपनियों को बिजनेस सुचारू रूप से चलाने के लिए कैश का पर्याप्त इन फ्लो चाहिए होता है और ऐसे समय में ही वर्किंग कैपिटल लोन्स की जरूरत पड़ती है.

वर्किंग कैपिटल फाइनेंस की जरूरत क्यों पड़ती है?

बिजनेस को सुचारू रूप से चलाने के लिए आमदनी, खर्चे, नुकसान, कैश का इन फ्लो और आउटफ्लो की अच्छी तरह समीक्षा की जरूरत पड़ती है. बिजनेस को यह समझना होगा कि कैसे ये पहलू कंपनी की फंडिंग क्षमता पर प्रभाव डालती हैं और इन्हें काबू करने के लिए क्या कदम उठाना पड़ेगा. इसके लिए उन्हें फाइनेंशियल स्टेटमेंट जैसे बैलेंस शीट, पी एंड एल अकाउंट्स की समीक्षा करनी होगी ताकि खाली पड़े फासले को भरा जा सके. इस समीक्षा से आपको मालूम चल जाएगा कि फंडिंग की कितनी राशि की आपको जरूरत पड़ेगी.

क्या है वर्किंग कैपिटल?

कई बार ऐसा होता है कि कोई कंपनी लगातार मुनाफा कमा रही है और फिर भी पर्याप्त नकदी प्रवाह या वर्किंग कैपिटल नहीं जुटा पा रही है. वर्किंग कैपिटल आपके रोजाना के बिजनेस खर्चे के भुगतान के लिए जरूरी है. प्रासंगिक स्टेटमेंट्स को पढ़ने से आप फैसला कर पाएंगे कि वर्किंग कैपिटल के लिए आपको कितनी राशि चाहिए. वर्किंग कैपिटल लोन्स आमतौर पर वित्तीय जरूरतें जैसे दैनिक मजदूरी, देय खाते और अन्य खर्चों के लिये लिए जाते हैं. ये लोन असुरक्षित होते हैं और कारोबारी इन्हें छोटी अवधि के लिए ले सकते हैं. इन लोन्स पर लागू ब्याज दरें और अवधि हर कर्जदाता की अलग-अलग हो सकती है.

वर्किंग कैपिटल लोन्स कब लिए जा सकते हैं?

ये लोन मौजूदा ऑर्डर या उन इनवॉयस पर आधारित होते हैं, जिनका भुगतान किया जाना बाकी है. इसलिए, उन्हें उस राशि के लिए नहीं खरीदा जा सकता है, जो एक कंपनी की ओर से भुगतान लायक नहीं है. यह इसे वापस भुगतान नहीं कर पाने से जुड़े जोखिमों को दूर करता है. अगर किसी बिजनेस का लोन में एक अच्छा रिकॉर्ड है, तो वह इस तरह के लोन को खरीदने के लायक है. इसके अलावा, इस प्रकार के लोन्स में उनके खिलाफ कोई सिक्योरिटी नहीं होती है. वर्किंग कैपिटल लोन्स मशीनरी लोन्स, अकाउंट्स रिसिवेबल्स, कम अवधि के लिए लाइन ऑफ क्रेडिट्स से लेकर सब कुछ कवर करते हैं. उनके पास चुकौती में लचीलापन होता है जो इसे और भी अधिक कस्टमर-फ्रेंडली बनाता है.

वर्किंग कैपिटल लोन्स के विभिन्न प्रकार

कैश की तरलता बनाए रखने और परिचालन खर्च को पूरा करने के लिए खरीदे गए लोन किसी बिजनेस की जरूरतों और प्राथमिकताओं पर निर्भर करते हैं. इन्हें निम्नलिखित तरीकों से खरीदा जा सकता है:

बैंक ओवरड्राफ्ट:  बैंक ओवरड्राफ्ट को कैश क्रेडिट भी कहा जाता है. इस सुविधा का फायदा अधिकतर बिजनेस उठाते हैं. वहीं ऑपरेटिंग पेमेंट्स के भुगतान के लिए इसका इस्तेमाल करने को लेकर खरीदार को एक विशिष्ट राशि मिलती है. ब्याज की दर और लाइन ऑफ क्रेडिट उधार देने वाले प्राधिकरण के साथ कंपनी के रिश्ते पर भी निर्भर करते हैं.
इसके अलावा, व्यवसायों को पूरी राशि के बजाय केवल उस राशि पर ब्याज का भुगतान करना होता है जो उनके द्वारा इस्तेमाल की जाती है. यह सबसे ज्यादा लागत प्रभावी समाधान है, क्योंकि उधार लेने वाला राशि जमा करता रहता है, वह इसे नियोजित करता है और ब्याज की लागत को बचाता है.

अकाउंट रिसिवेबल फाइनेंसिंग: अकाउंट रिसिवेबल फाइनेंसिंग भी बिजनेस के लिए एक तरह का वर्किंग कैपिटल लोन है, जो उसे मिले सेल्स ऑर्डर्स के फाइनेंसिंग के लिए चाहिए होते हैं और डिलिवरेबल्स मुहैया कराने के लिए पेमेंट्स की जरूरत पड़ती है.
अकाउंट्स रिसिवेबल्स फाइनेंसिंग सिर्फ सेल्स ऑर्डर्स के लिए होते हैं, जो पुष्ट होते हैं लेकिन उसके भुगतान के लिए कंपनियां पर्याप्त फंड्स नहीं जुटा पातीं. लेकिन इस लोन को लेने के लिए बिजनेस का शानदार रिकॉर्ड होना चाहिए.

फैक्टरिंग: ये लोन्स भी अकाउंट्स रिसिवेबल्स फाइनेंसिंग की तरह होते हैं. लेकिन दोनों के बीच एक फर्क है कि लोन की राशि फ्यूचर क्रेडिट रसीद पर आधारित होती हैं. यह कुछ चुने हुए खातों को देय करने की व्यवस्था करने और उन्हें पार्टी को बेचने की प्रक्रिया है जो बिजनेस को पैसा मुहैया करता है. देय खातों को उनके असली मूल्य से कम राशि पर बेचा जाता है. यहां “फैक्टर पार्टी” उस कंपनी के देनदारों से राशि जमा करती है, जिस पर वह फाइनेंसिंग करती है. यह लोन या तो सहारे के साथ है या इसके बिना. सहारे के मामले में अगर देनदार रकम का भुगतान नहीं करते तो कंपनी को उसे वहन करना पड़ता है, अगर यह सहारे के बिना है तो फैक्टर पार्टी जोखिम उठाती है.

ट्रेड क्रेडिट: एक वर्तमान या भावी सप्लायर इस तरह के वर्किंग कैपिटल लोन को बिजनेस लोन के रूप में मुहैया कराते हैं. आसान शब्दों में, यह उस सप्लायर की ओर से क्रेडिट अवधि का विस्तार है. यह विस्तार कंपनी की तरलता स्थिति और भुगतान इतिहास पर निर्भर करता है. सप्लायर कंपनी के क्रेडिट रिकॉर्ड की जांच करता है और देखता है कि उसकी ओर से अवधि को बढ़ाए जाने या फिर ट्रेड क्रेडिट लोन देने से पहले कंपनी पैसा  चुकाने के काबिल है या नहीं. क्रेडिट का जब फ्री पीरियड खत्म होता है तो ट्रेड क्रेडिट एक मामूली फीस लगाता है. यह तब लगता है, जब कंपनी के पास भारी मात्रा में ऑर्डर्स हों.

बिल डिस्काउंटिंग: किसी बिजनेस में सबसे आम परिचालन है सेल्स पर बिल पैदा करना. ये स्टेटमेंट्स सबूत या फिर सत्यापित दस्तावेज होते हैं, जिन्हें कंपनी देनदारों के आगे पेश करती है, जिससे उन्हें जरूरी धनराशि मिल जाती है. बैंक कंपनियों को ब्याज दरों पर उस बिल की राशि पर छूट जोड़ने के बाद उन्हें राशि देकर करके यह सुविधा मुहैया कराते हैं.बाकी की बची हुई राशि विक्रेता को वापस कर दी जाती है. जैसे ही बिल मैच्योर होता है, बैंक उस डिस्काउंट किए हुए पैसे को देनदारों से वापस ले लेता है.

बैंक गारंटी: बैंक गारंटी से मतलब है बैंक की वित्तीय जिम्मेदारियां, जो पैसे या किसी अन्य प्रकार के फंड्स पर निर्भर नहीं होतीं. किसी थर्ड पार्टी की ओर से होने वाले जोखिम की संख्या को कम करने के लिए कंपनी इसे हासिल कर सकती है. जोखिम या तो तीसरे पक्ष की ओर से भुगतान न करने या किसी भी सर्विस को हासिल करने के बारे में हो सकते हैं. लेकिन यह गारंटी सिर्फ विक्रेता ही खरीद सकता है, जब इनमें किसी कार्य का प्रदर्शन न हो. कुछ जमानत के अलावा बैंक न्यूनतम कमीशन भी लेते हैं.

लेटर ऑफ क्रेडिट: लेटर ऑफ क्रेडिट एक अन्य प्रकार का वर्किंग कैपिटल फाइनेंस है जो बैंक गारंटी के समान होता है और ग्राहक के द्वारा अधिग्रहित किया जाता है. लोन के दोनों रूपों में अंतर यह है कि लेटर ऑफ क्रेडिट में, जब विपरीत पक्ष परिभाषित शर्तों के अनुसार डिलिवर करता है, तो बैंक इसके लिए भुगतान करता है. इसलिए ग्राहक एक लेटर ऑफ क्रेडिट खरीदेगा जिसे विक्रेता को कुछ नियम और शर्तों के साथ भेजा जाएगा. जैसा कि विक्रेता समझौते के अनुसार सेवाओं का प्रदर्शन करता है, उसे बैंक की ओर से पैसे मिलते हैं और खरीदार बैंक को अपना बकाया चुकाएगा.

शॉर्ट टर्म लोन्स:  जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है इन लोन्स में ब्याज दर पहले से तय होती है और पुनर्भुगतान की अवधि भी. यह अवधि एक साल हो सकती है और इसके साथ गारंटी भी जुड़ी होती है. यह इस पर भी निर्भर करता है कि कंपनी के कर्ज देने वाली संस्था के साथ रिश्ते कैसे हैं. लिहाजा अगर कंपनी का क्रेडिट के मामले में रिकॉर्ड शानदार है तो इस लोन को हासिल किया जा सकता है जिसे किसी भी सुरक्षा के लिए लोन का भुगतान किया जा सकता है.

इक्विटी फाइनेंस: इस तरह का वर्किंग कैपिटल लोन आमतौर पर बिजनेस इन्वेस्टमेंट्स जैसे इन्वेस्टर्स, दोस्तों, परिवार या होम इक्विटीज से लिए जाते हैं. ये उन बिजनेस के लिए शानदार विकल्प है, जो अपना परिचालन शुरू कर रहे हैं. इसके अलावा, बिलों का भुगतान करने और शुरुआत में पूंजी जुटाने के लिए यह सबसे यथार्थवादी समाधान हो सकता है, क्योंकि कंपनी के पास क्रेडिट रिकॉर्ड नहीं है.

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